गुरुकुल समान आश्रमोंका निर्माण !

साधकों को पूर्णकालीन साधना के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध हो, इसलिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने गुरुकुल समान आश्रमों की निर्मिति की है ।

विविध संतों द्वारा किया गया परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का सम्मान !

संत ही संतों को पहचान सकते हैं और वे ही अन्य संतों के कार्य का महत्त्व समझ सकते है । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के आध्यात्मिक कार्य का महत्त्व ज्ञात होने से अनेक संतों ने परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी को सम्मानित एवं पुरस्कार देकर गौरवान्वित किया ।

आश्रम के रसोईघर का रूपांतर आदर्श अन्नपूर्णा कक्ष में करते समय परम पूज्य डॉक्टरजी का अथक परिश्रम और सब स्तरों पर सुनियोजन तथा फलोत्पत्ति बढाने हेतु मार्गदर्शन !

प.पू. डॉक्टरजी ने अन्नपूर्णाकक्ष को सुव्यवस्थित करने के लिए अथक प्रयास किया । आरंभ के दिनों में छोटी-छोटी बातों से अन्नपूर्णाकक्ष की बडी योजनाआें तक उन्होंने व्यक्तिगत रूप से ध्यान दिया और रसोईघर को अन्नपूर्णा-कक्ष बनाया ।

विविध संतों से मार्गदर्शन प्राप्त कर, अध्यात्मशास्त्र का अध्ययन और वैसा आचरण करनेवाले परम पूज्य डॉक्टरजी !

‘डहाणू के एक संत परम पूज्य (प.पू.) अण्णा करंदीकर आयुर्वेदीय चिकित्सालय में रोगियों को देखने प्रत्येक महीने ३ दिन दादर (मुंबई) आते थे । उस समय प.पू. (डॉ.) आठवलेजी अध्यात्म का प्रायोगिक दृष्टि से अध्ययन कर रहे थे ।

भारत मोर्चा के संस्थापक तथा पूर्व सांसद श्री. वैकुंठलाल शर्मा उपाख्य प्रेमसिंह शेर ने प्राप्त किया ६३ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर

अखंड भारत मोर्चा के संस्थापक, साथ ही देहली के पूर्व सांसद श्री. वैकुंठलाल शर्मा उपाख्य प्रेमसिंह शेर का १७ दिसंबर को ८७ वां जन्मदिवस मनाया गया, साथ ही अखंड भारत मोर्चा का १८ वां स्थापना दिवस भी मनाया गया ।

प्रखर हिन्दुत्वनिष्ठ नियतकालिक सनातन प्रभातके माध्यमसे पत्रकारिताका कार्य

हिन्दू राष्ट्र स्थापना का संदेश प्रसारित करने के लिए (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवलेजी ने सनातन प्रभात नियतकालिक आरंभ किए । वे सनातन प्रभात समूह के संस्थापक संपादक हैं । २८ अप्रैल १९९८ से १९ अप्रैल २०००, इस कालखंड में वे संपादक रहे ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी को हुई गुरुप्राप्ति और उनके द्वारा किया अध्यात्मप्रसार !

सम्मोहन उपचारों से ठीक न हुए मनोरोगी, संतों द्वारा बताई साधना करने पर ठीक होते हैं, यह ध्यान में आने पर परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने वर्ष १९८३ से वर्ष १९८७ की अवधि में अध्यात्म के अधिकारी लगभग ३० संतों के पास जाकर अध्यात्म का अध्ययन किया और अध्यात्मशास्त्र की श्रेष्ठता का भान होने पर स्वयं साधना आरंभ की ।

साधना की दृष्टि से १४ विद्या और ६४ कलाआें की शिक्षा का बीजारोपण करनेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी !

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शनानुसार ‘ईश्‍वरप्राप्ति हेतु कला’ यह ध्येय सामने रखकर अनेक साधक चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्यकला, वास्तुविद्या आदि कलाआें के माध्यम से साधना कर रहे हैं ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजीका जन्म, आध्यात्मिक वृत्तिसम्पन्न परिवार, और शिक्षा तथा छात्र जीवनमें किया कार्य

होनहार बिरवान के, होत चीकने पात इस उक्ति के अनुसार परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी का जन्म ६ मई १९४२ को श्री. बाळाजी वासुदेव आठवलेजी और श्रीमती नलिनी बाळाजी आठवलेजी के परिवार में हुआ । आगे वे दोनों संतपद पर विराजित हुए ।

प.पू. दादा महाराज झुरळे

१. वात्सल्यपूर्ण वाणी से अध्यात्म सिखानेवाले प.पू. दादा महाराज झुरळे ! वर्ष १९८३ में अध्यात्म में जिज्ञासा जागृत होने के पश्चात मैं अध्यात्म समझने के लिए अनेक सन्तों के पास जाता था । उनमें से एक थे प.पू. दादा महाराज झुरळे । उन्हें मैं दादा कहता था । मैं दादा के पास अध्यात्म सीखने के … Read more